ऋषिकेश, 20 सितम्बर। परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज को उनके दीर्घकालीन सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक योगदान के लिये प्रतिष्ठित ‘श्री रामकिंकर भारत भूषण सम्मान’ से विभूषित किया गया। श्री रामकिंकर विचार मिशन के पूज्य स्वामी मैथिलीशरण जी महाराज ने यह सम्मान पूज्य स्वामी को अर्पित किया।यह सम्मान संत परंपरा की उस अखंड धारा का अभिनंदन है, जो आध्यात्मिक चेतना को सेवा, संस्कार, करुणा और लोककल्याण से जोड़ती है। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों, गंगा संरक्षण, पर्यावरण जागरण, स्वच्छता, सेवा तथा वैश्विक शांति के संदेश को देश-विदेश में व्यापक स्तर पर प्रसारित किया है।पूज्य स्वामी मैथिलीशरण महाराज ने कहा कि पूज्य स्वामी का जीवन साधना से सेवा और सेवा से विश्वकल्याण की प्रेरणादायी यात्रा है।पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने सम्मान को श्रीरामकिंकर महाराज की पावन स्मृति को समर्पित करते हुए कहा कि यह सम्मान संत परंपरा, सेवा-साधना और सनातन संस्कृति के प्रति सम्मान है।परमार्थ निकेतन की पावन धरा पूज्य संतों की चरणरज, सत्संग की अमृतधारा और साधना की अखंड परंपरा से सिंचित एक जीवंत तीर्थ है। माँ गंगा के पावन तट पर स्थित यह भूमि उन दिव्य स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए है, जहाँ समय-समय पर भारत की महान संत परंपरा के अनेक ऋषितुल्य संतों, महापुरुषों और विद्वानों ने आकर सत्संग, कथा और साधना की गंगा प्रवाहित की।परमार्थ निकेतन के इस दिव्य आध्यात्मिक वातावरण में वृंदावन से पूज्य स्वामी अखंडानन्द जी महाराज, वेदों के परम विद्वान पूज्य स्वामी गंगेश्वरानन्द महाराज, पूज्य डोगरे महाराज, माँ आनंदमयी तथा अनेक संत-महापुरुषों का आगमन हुआ। इन महापुरुषों के चरणों से यह भूमि धन्य हुई और उनके श्रीमुख से निकले ज्ञान, भक्ति, वैराग्य एवं सेवा के संदेशों ने असंख्य साधकों के अंतर्मन को स्पर्श किया।इन्हीं दिव्य स्मृतियों को पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने पूज्य स्वामी मैथिलीशरण महाराज के साथ साझा करते हुए संतों की उस अखंड परंपरा का स्मरण किया। संतों की साधना, सत्संग और तपस्या से निर्मित आध्यात्मिक एवं तीर्थ नगरी का स्वरूप प्रदान किया।पूज्य स्वामी ने स्मरण करते हुए कहा कि पूज्य रामकिंकर महाराज प्रतिवर्ष परमार्थ निकेतन पधारते थे और यहाँ कथा एवं सत्संग के माध्यम से रामकथा की अमृतधारा प्रवाहित करते थे। पूज्य स्वामी ने कहा कि आज आवश्यकता है कि हम अपने तीर्थों की इस दिव्यता को समझें और तीर्थ को तीर्थ बनाए रखने का संकल्प लें। हमारे तीर्थ स्वच्छ हों, निर्मल हों, प्रदूषणमुक्त हों, नशामुक्त हों और यहाँ आने वाले प्रत्येक साधक बाहरी स्वच्छता के साथ-साथ अंतःकरण की स्वच्छता का भी अनुभव करे। संतों ने हमें तीर्थ दिए हैं; अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ियों को उन तीर्थों की पवित्रता सुरक्षित रूप में सौंपें। परमार्थ निकेतन की यह परंपरा आज भी उसी सत्संग, सेवा, साधना और संस्कार की अखंड ज्योति को आगे बढ़ा रही है।