परमार्थ निकेतन से भावपूर्ण विदाई लेकर रवाना हुए भारत के 14वें पूर्व उपराष्ट्रपति – Tirth Nagri Uttarakhand

परमार्थ निकेतन से भावपूर्ण विदाई लेकर रवाना हुए भारत के 14वें पूर्व उपराष्ट्रपति

ऋषिकेश, 6 अक्टूबर। परमार्थ निकेतन की पावन धरती पर आध्यात्मिकता, श्रद्धा, सेवा और आत्मीयता से परिपूर्ण प्रवास के पश्चात भारत के 14वें पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ एवं सुदेश धनखड़ ने आज परमार्थ निकेतन से भावपूर्ण विदाई ली।

परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती एवं डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती ने धनखड़ एवं धनखड़ को आत्मीय भावों के साथ विदाई दी। इस अवसर पर पूज्य स्वामी एवं साध्वी ने उन्हें इलायची की सुगंधित माला एवं रुद्राक्ष का पौधा भेंट किया।

परमार्थ निकेतन की पावन गंगा तट की ऊर्जा, पूज्य स्वामी का आशीर्वाद और आध्यात्मिक वातावरण धनखड़ जी एवं धनखड़ के प्रवास को एक विशेष अनुभूति प्रदान की। धनखड़ जी ने परमार्थ निकेतन में माँ गंगा की आरती, विश्व शान्ति हवन, सत्संग तथा आध्यात्मिक कार्यक्रमों में सहभाग कर भारतीय संस्कृति, सनातन परम्पराओं और सेवा के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा एवं भावनाएँ व्यक्त कीं।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारतीय संस्कृति जीवन को देखने, जीने और सबके कल्याण की कामना करने की एक महान दृष्टि है। इसकी आत्मा में सेवा, संस्कार, करुणा, सह-अस्तित्व और वसुधैव कुटुम्बकम् का भाव है। सनातन संस्कृति की शक्ति उसकी जीवंतता में है, जो युग बदलने के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जाती है। आज आवश्यकता है कि हम अपनी इस अमूल्य विरासत को केवल जानें नहीं, बल्कि जिये और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।
डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि अपनी जड़ों से जुड़ना अर्थात् अपने भविष्य को मजबूत बनाना है। भारतीय संस्कृति हमें केवल परम्पराएँ नहीं देती, वह हमें पहचान, आत्मविश्वास और जीवन की दिशा देती है। आज का युवा तकनीक से दुनिया बदल सकता है, लेकिन संस्कार उसे यह समझ देते हैं कि दुनिया को किस दिशा में बदलना है। सनातन का अर्थ ठहर जाना नहीं, बल्कि हर युग में सत्य, सेवा और करुणा के साथ आगे बढ़ना है। अपनी संस्कृति को जानिए, अपनी शक्ति को पहचानिए और अपने जीवन को ऐसा बनाइए कि आपकी सफलता केवल आपकी न हो समाज और राष्ट्र की भी बने।
जगदीप धनखड़ ने भी परमार्थ निकेतन की आध्यात्मिक ऊर्जा, माँ गंगा की दिव्यता और पूज्य स्वामी जी के स्नेह एवं मार्गदर्शन के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यहां एक ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति है, जो उनके हृदय में सदैव जीवंत रहेगी। श्री धनखड़ जी एवं श्रीमती धनखड़ जी अत्यंत गद्गद, आत्मीय और आध्यात्मिक भावों से ओतप्रोत होकर परमार्थ निकेतन से विदा ली।

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